रविवार, 28 मई 2017

दरख़्वास्त

जिस बच्चे के हाथ थमाईं कलम एक किताबें दो
उस बच्चे को आज तुम न मज़हब की दीवारें दो

रास्ता उसका मंज़िल उसकी पंख भी उसी के हैं
आज उसको आसमान में आज़ाद हो उड़ जाने दो

वो डोर मुहब्बत वाली जिसने दुनिया को बांधा है
उस डोर को काट सकेंगी जो ऐसी न तलवारें दो

दो रोटी की ख्वाहिश है और नहीं है कोई उम्मीद
दो रोटी के साथ ही सजती ख्वाब की मीनारें दो

है यकीन हमको आज कि मौसम फिर से बदलेगा
अपने खेतों में भी आयेंगी फिर से वो ही बहारें दो

कल का सूरज आसमान में नई उम्मीद भी लाएगा
सो जाओ तुम रख के ख्वाब तकिये के सिरहाने दो
                             





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