शनिवार, 8 जुलाई 2017

क्या उसका मज़हब होता है

चाँद जो नभ में उगता है
क्या उसका मजहब होता है
फूल चमन में खिलता है
क्या उसका मजहब होता है

आकाश में जो उड़ते फिरते हैं
रंग बिरंगे से ये पक्षी
उनको रोक सके सरहद कोई
ऐसी तो नहीं दिखती
बादल भी आकर बारिश में
सारी दुनिया भिगोता है
मुझको कोई तो ये समझा दो
क्या इनका मजहब होता है
चाँद जो नभ में उगता है
क्या उसका मजहब होता है

तलवार बंदूकें लहू में अक्सर
लोग जो आकर धोते हैं
नफरत के बीज लोग यहाँ
जाने क्यों ही बोते हैं
भूख जब लगती है ज़ोरों से
तो हर एक बच्चा रोता है
कोई उसको तब बतलायेगा
क्या उसका मजहब होता है
चाँद जो नभ में उगता है
क्या उसका मजहब होता है

शांति की है कुटिया पावन
नफरत वाली मीनारों से
राजपाठ ही हाँक रहे हैं नेता
रोज नए हथियारों से
धर्म के नाम जो क़त्ल हो रहे
देख अल्लाह ईश्वर रोता है
कोई अब तो बतला दो ये
क्या प्रेम का मजहब होता है
चाँद जो नभ में उगता है
क्या उसका मजहब होता है

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें