आओ चाँद देख कर आते हैं
ये छोटी सी रातें जब लंबी हो जाती हैं
और लंबी रातों में जब नींद नहीं आती है
कुछ ऐसी रातों में जब बच्चे उठ जाते हैं
भूख के मारे पेट पकड़ कर जब रोते जाते हैं
उनको चाँद दिखा कर रोटी के ख्वाब दिखाते हैं
और उनसे कहते हैं आओ लोरी तुम्हें सुनाते हैं
या कहते हैं हाथ पकड़ कर,
आओ चाँद देख कर आते हैं।
जब सर्दी की ठंडी रातों में नंगा जिस्म तड़पता है
जब सड़क पर पड़ा गरीब ठंड की कारण मरता है
जब ऊँचे महलों में कुछ लोग मौसम को झुठलाते हैं
और झोपड़ी में हरिया जैसे हर मौसम में घबराते हैं
जब गंगा जमुना का पानी देहरियों पर चढ़ता है
तब मज़हब की तलवारों का रंग उतरता दिखता है
तब नेता हेलीकाप्टर में आकर सब्ज़बाग़ दिखलाते हैं
और उनसे कहते हैं, आओ लोरी तुम्हें सुनाते हैं
या कहते हैं हाथ पकड़ कर,
आओ चाँद देख कर आते हैं।
द्रोपदी की साड़ी अब भी सरे राह उतरती है
कोई कृष्ण जैसी उम्मीद अब क्यों नही जगती है
जाने कितनी सीताओं को रावण हर ले जाता है
फिर इन जूठे मर्दों का सम्मान कहाँ खो जाता है
कोई दुर्योधन को मारने अब भीम नही आते हैं
या नुमाइश के लिए ही जिम में पसीना बहाते हैं
ऐसे नक़ली मर्द ही तो अब नामर्द कहलाते हैं
रक्षा करने के वक़्त ही ये अपनी पीठ दिखाते हैं
और उनसे कहते हैं, आओ लोरी तुम्हें सुनाते हैं
या कहते हैं हाथ पकड़ कर,
आओ चाँद देख कर आते हैं।
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