कभी मुश्किल तो कभी आसान हुआ हूँ मैं
हर बार नए आगाज़ से परेशान हुआ हूँ मैं
कभी इठलाया हूँ मैं ख़्वाबों में ख्यालों में
कभी इस ज़िन्दगी से इतना हैरान हुआ मैं
अपनों ने जब से पहचानना छोड़ दिया है
अपने ही घर में कोई मेहमान हुआ हूँ मैं
कल तलक़ जो दिन और रात मेरे साथ थे
उन्हीं रिश्तों में कोई बोझ अंजान हुआ मैं
ज़रा सलीके से कहते तो उफ़ भी ना करूँ
उजड़ी हुई कोई बस्ती का मकान हुआ हूँ मैं
भूल गए हैं जब से वो अपनी मुहब्बत को
गुजरे हुए वक़्त का आज निशान हुआ हूँ मैं
लोगों ने भी खूब बातें बनाई मेरी कहानी की
कुछ नहीं बस मुहब्बत से अनजान हुआ हूँ मैं
मेरे दर्द का वजूद तुमको क्या समझाऊँ अब
ज़िंदा भी हूँ और खुद ही शमशान हुआ हूँ मैं
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