कौन कहता है कि भीड़ का चेहरा नहीं होता?
सच तो ये है कि हर भीड़ का चेहरा है।
कभी वो चेहरा धर्म बन जाता है जो अलग दिखने वाले चेहरे को मिटाना चाहता है।
कभी जाति का चेहरा लग जाता है जो अपने से छोटे चेहरे को दबाना चाहता है।
कभी भाषा चेहरे का रूप ले लेती है।
कभी अफवाहों की धूप में चेहरा लाल दिखने लगता है।
कभी उसे आदमी कहा जाता है जो अपने जैसे ही औरत के चेहरे की आज़ादी सहन नहीं कर पाता।
कभी चेहरा रंग, भाषा या प्रान्त का रूप ले लेता है। लेकिन नफरत ही दिखाई देती है इन चेहरों पर।
कभी बलात्कारी तो कभी दंगाई और कभी हत्यारा दिखता है चेहरा।
कभी परायों में अपना तो कभी अपनों में पराया दिख जाता है चेहरा।
राजनीति में सभी चेहरे एक ही दिखाई देते हैं, दूसरे शब्दों में कहूँ तो हर चेहरे में राजनीति दिखती है।
जाने कितनी तरह के चेहरे अब दिखते हैं!
सच कहूँ तो,
हर चेहरे के पीछे कुछ लोग ही तो रहते हैं।
वो लोग कभी जिनका सिर्फ एक चेहरा "मुल्क" हुआ करता था अब नफरतों के हज़ार चेहरे लगा कर घूमते हैं।
कभी तिरंगे के रंग में नज़र आने वाले चेहरे आज खुद को भगवा या हरे रंग में बाँट कर नफरत की सूली चढ़े जा रहे हैं। लेकिन इन तमाम चेहरों की वजह से एक चेहरे को बहुत तकलीफ होती है और वो चेहरा है "हिंदुस्तान" का।
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