मंगलवार, 11 जुलाई 2017

ग़ज़ल

जो काँच जैसे लोग थे वो आईने में बदल गये
लोमड़ी से लोग फिर पतली गली निकल गये

हमने सहे थे सभी दर्द मिले थे जो ज़ख्म से
पहले जले दूध से फिर छाछ से भी जल गये

कोई किस्सा इश्क़ का ऐसे कहाँ खतम हुआ
मुहब्बत के जख्म थे कलेजे लग के पल गये

आँखें भी रात भर बादल की तरह बरस गयीं
बादल बरसने आये तो अश्क़ देख बदल गये

उनसे मिलने के वक़्त शिकवे हज़ार थे मगर
उनको टूटा देखा तो हम ही खुद संभल गये

और एक ज़िन्दगी जो उनके साथ नसीब हो
वरना लगेगा हमें कि मौत से हम छल गये

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