रविवार, 9 जुलाई 2017

दिल मतवाले रखना (ग़ज़ल)

जो तुमको मंजूर है यूँ नफरत को पाले रखना
तो तुम ही अपने पास सुबह के उजाले रखना

रात के अंधियारे को आज बुरा कहते है लोग
कैसी ज़िन्दगी है साथ दिलों को काले रखना

हमें अपनी मुहब्बत का तो सरेआम नाज़ रहेगा
ये नफरतों के साए तुम अपने ही हवाले रखना

महफ़िल में जो आगए तो नक़ाब उतरेंगे जरूर
ये कैसे मुमकिन है शराफत को संभाले रखना

सच कहने को जरुरी नहीं पसंद करें सब लोग
कभी सच कहना तो अपने दिल मतवाले रखना

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