गुरुवार, 27 जुलाई 2017

ऐ ज़िन्दगी

ऐ ज़िन्दगी

तू क्या समझती है खुद को। तू मुश्किलें खड़ी करेगी और हम डर जायेंगे। अगर ऐसे हम डरने लगे तो हमारा क्या होगा!! ये ज़माना है ना वो तुझसे भी बुरा है। तू ज्यादा से ज्यादा रूठ कर हमको एक बार में मार देगी। लेकिन ये ज़माना हमको रोज मारता है। हम इससे नहीं डरते तो तुझसे क्या ख़ाक डरेंगे।
जानती है हर रोज सुबह जमाना हम सभी से हमारी औकात पूछता है। किसी को अलग मज़हब के नाम पर सताता है तो किसी को रंग के नाम पर। किसी को अमीर होने पर तकलीफ देता है तो किसी को गरीब होने पर। महिलाओं को हर जगह महिला होने की सजा देता है ये ज़माना। घर बाहर आफिस स्कूल कॉलेज यहाँ तक कि न्याय और सुरक्षा जहाँ मिलती है वहाँ भी सताया जाता है औरत को। तुझे क्या लगता है कि पुरुषों को छोड़ देता है ज़माना? कहीं अफसर, बाबू, जमींदार, नेता और मंत्री लोगों को पल पल मरने पर मजबूर करते हैं तो कहीं लोग ही ईमानदार अफसर, बाबू, जमींदार, नेता और मंत्री को परेशान करते हैं। सच कहूँ तो ये ज़माना जो खुद को विकसित और सभ्य कहता है वो उतना ही पिछड़ा और लालची है। गंवार है ये ज़माना।
लेकिन ज़िन्दगी मुझे ये बता तू इस ज़माने को क्यों नहीं सता पाती है। इसको भी कभी रुला। बहुत से मजलूमों की दुआएँ लगेंगी तुझे। या फिर तू भी डरती है ज़माने से।
तुझे डरना है तो डर। लेकिन हम नहीं डरेंगे। हर बार हम लड़ने को खड़े होंगे। कभी भगत सिंह बनकर तो कभी गाँधी बनकर। कभी राजा राम मोहन राय बन कर तो कभी सुभाष बन कर। कभी लक्ष्मी बाई बनेंगे तो कभी अब्दुल कलाम बन कर खड़े हो जायेंगे। तू जितना रोड़े डालेगी हमारी राह में हम उतने ही मजबूत बन जायेंगे।
क्योंकि हम तुझसे नहीं डरते ज़िन्दगी और न ही डरते हैं ज़माने से। जो करना है कर ले जा पूरी आजादी है तुझे।
                                                    - हिमांशु

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