ये तेरी दुनिया मेरी दुनिया
किस मोड़ पे ठहरी दुनिया
दिखती तो है अच्छी खासी
अंधी दुनिया बहरी दुनिया
कितने रंग छुपाए है फिरती
ऊपर से है सुनहरी दुनिया
कभी ये मातम गीत सुनाए
कभी लगे रंग लहरी दुनिया
वक़्त से तो है रूठी रूठी
वैसे है आठ पहरी दुनिया
इसे समझना जो चाहो तो
समंदर से है गहरी दुनिया
ऊपर से है ये हट्टी कट्टी
अंदर से है छरहरी दुनिया
कहीं सुबह का भोलापन है
कभी है तेज़ दुपहरी दुनिया
कभी लगे है गाँव सी मीठी
या नमक सी शहरी दुनिया
कहीं तो इफ़्तार की दावत
कहीं हुई है सहरी दुनिया
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें