काली काली रातों के पीछे उजले सबेरे हैं
सारे दर्द ख़्वाबों के आके यहीं पे ठहरे हैं
सारा दिन ज़ख्मो से हम परेशान रहते हैं
हँसी चुका के पाए जो हमने पल सुनहरे हैं
कोई बात सुनी नही इश्क़ की रात बाकी है
मयख़ाने में पूँछें लोग कितने जाम ठहरे हैं
हर पल में रुसवाई जाने कैसी किस्मत है
कैसे ज़िंदा इश्क़ रहा उस पर इतने पहरे हैं
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