मन जानत नाहीं चैन
मन जानत नाहीं चैन
तुम बिन बन बावरा
फिरत रहत दिन रैन
मन जानत नाहीं चैन
मन जाने है पीर मन की
हम तुम जान न पाए
मन सुलगाये प्रेम अगन
मन ही फिर नीर बहाए
हालत अब कैसे सुनाए
कौन है कितना बेचैन
मन जानत नाहीं चैन
विरह का ये दर्द समाये
अँखियन राह तकता जाए
कैसी पहेली है ये मन भी
जो भी जाने खुद ही बुझाये
पिय मिलन को पल पल तरसे
आस भरे हैं जो नैन
मन जानत नाहीं चैन
मन जानत नाहीं चैन
तुम बिन बन बावरा
फिरत रहत दिन रैन
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