चलो आज फिर दर्द को पुकारा जाए
इस बहाने सही नशा तो उतारा जाए
हो कहीं वजूद मुहब्बत का ज़रा देखें
अपनी तन्हाई को थोड़ा संवारा जाए
अभी शिद्दत अधूरी सी है मुहब्बत में
आँसुओं से धोकर इसे निखारा जाए
रोज रोज जीतना भी मज़ा नहीं देता
आज इक बार अपनों से हारा जाए
बड़ा नाजुक है दिल सँभाल के रखना
मुहब्बत में कहीं बेमौत न मारा जाए
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें